Nisha

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सैर दूसरे दरवेश

     न गाह जवान बा दस्तूर ज़र्द बेल पर बांधे हुए आ पंहुचा ,और उतर कर दो जानो बैठा। एक हाथ में नंगी सैफ और एक हाथ में  बैल की नाथ पकड़ी और मर्तबान गुलाम को दिया। गुलाम हर एक को दिखा कर ले गया ,आदमी देख कर रोने लगे। उस जवान ने मर्तबान फोड़ा ,और गुलाम को एक तलवार ऐसी मारी की सर जुदा हो गया। और आप सवार  हो कर मुड़ा ,मैं उसके पीछे जल्द क़दम उठा कर चलने लगा ,शहर के आदमियों ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा : यह क्या करता है ? क्यू जान बूझ कर मरता है ,अगर ऐसा ही तेरा नाक दम में आया है ,तो बेहतरी तेरी मरने की है  .हर चंद मैंने मन्नत की और ज़ोर भी किया ,की किसी सूरत से उनके हाथ से छोटू ,छुटकारा न हुआ।  दो चार  आदमी लिपट गए। और पकडे हुए बस्ती की तरफ ले आये ,अजब तरह क़लक़ फिर महीने भर गुज़रा। 

जब वह भी महीने तमाम हुआ और सलख का दिन आया ,सुबह को उसी सूरत से सारे आलम का वहा इज़्देहम हुआ।  मैं अलग सबसे ,नमाज़ के वक़्त उठ कर ,आगे ही जंगल में घुस गया और छिप गया। की यहाँ तो कोई मेरा मज़ाहम न होगा।  वह शख्स इसी क़ायदे से आया ,और वही हरकते कर कर सवार हुआ और चला गया। मैंने उसका पीछा किया और दौड़ता हुआ साथ हो लिया  .उस अज़ीज़ ने आहट से मालूम किया की कोई चला आता है। एक बारगी  बाग़ मोड़ कर ,एक नारा मारा और घुरका। तलवार खींच कर मेरे सर पर आ पंहुचा ,चाहता था की हमला करे  ,मैंने निहायत अदब से सलाम किया ,और दोनों हाथ बाँध कर खड़ा रह गया। वह क़ायदा दा सब जमा हुए  ,की ए फ़क़ीर तू न हक़ मारा गया होता ,पर बच गया ,तेरी हयात बाक़ी है। जा ,कहा आता है ? और जड़ाऊ खंजर मोतियों का  और आवज़ा लगा हुआ कमर से निकल कर मेरे आगे फेंका और कहा : इस वक़्त मेरे पास कुछ नक़द मौजूद नहीं तुझे  दू ,इसको बादशाह के पास लेजा ,जो तू मांगेगा मिलेगा। ऐसी शक्ल और रोअब उसका मुझ पर ग़ालिब  हुआ की न बोलने की क़ुदरत ,न चलने की ताक़त। मुंह बंद हो गयी ,पाव भारी हो गए।

इतना कह कर ,वह गाज़ी मर्द नारा भरता हुआ चला। मैंने दिल में कहा : हरचा बा दा बाद अब रह जा जाना तेरे हक़ में  बुरा है। फिर ऐसा वक़्त न मिलेगा। अपनी जान से हाथ धो कर भी रवाना हुआ। फिर वह फिरा और बड़े गुस्से से डांटा और मुक़र्रर इरादा  मेरे क़त्ल का किया। मैंने सर झटका दिया और सौ गंदवि की ऐ रुस्तम वक़्त के ! ऐसी ही एक सैफ मार की साफ़ दो टुकड़े हो जाऊ ,मैंने अपना खून माफ़ किया। वह बोला की ए शैतान की सूरत ! क्यू अपना खून न हक़ मेरी गर्दन पर चढ़ाता है और मुझे गुनहगार बनाता है ? जा अपनी राह ले ,क्या भारी पड़ी है ? मैंने उसका कहा न माना ,और क़दम आगे धरा ,फिर उसने दीदा व दांस्ता आना कानि दी ,और मैं पीछे लग गया।  जाते जाते  ,दो कोस वह झाड़ जंगल तये किया। एक चार दीवारी नज़र आयी। वह जवान दरवाज़े पर गया और एक नारा  मारा। .वह दरवाज़ा अपने आप खुल गया। वह अंदर बैठा ,मैं बाहर का बाहर खड़ा रह गया। इलाही अब क्या करू  ! हैरान था। बारे एकदम के बाद गुलाम आया और पैगाम लाया की चल तुझे रु बा रु बुलाया है ,शायद तेरे सर  पर अजल का फरिश्ता आया है। क्या तुझे कमबख्ती लगती थी ! मैंने कहा : ज़हे नसीब ! और बे धड़क उसके साथ  बाग़ के गया। 

आखिर एक मकान में ले गया जहा वह बैठा था। मैंने उसे देख कर फर्राशी सलाम किया। उसने इशारा बैठने की की ,मैं अदब से दो जानो बैठा। क्या देखता हु की वह मर्द अकेला मसनद पर बैठा है। और हथियार जरगिरि के आगे धरे। है  और एक झाड़ ज़मुर्रद का तैयार कर चूका है। जब उसके उठने का वक़्त आया ,जितने गुलाम उस शै नशीन के गिर्द  पेश हाज़िर थे ,हिजरो में छिप  गए। मैं भी विस्वास के एक कोठरी में जा घुसा। वह जवान उठ कर ,सब मकानों  की कुंडिया चढ़ा कर बाग़ ,के कोने की तरफ चला ,और अपनी बैल की सवारी को मारने  लगा। उसके  चिल्लाने की आवाज़ मेरे कान में आयी ,कलेजा कापने लगा। लेकिन इस माजरे के दरयाफ्त करने की खातिर  यह सब आफ़ते सही थी। डरते डरते दरवाज़ा खोल कर ,एक दरख्त के तने की आड़ में जाकर खड़ा हुआ और देखने  लगा। जवान ने वह सुंता जिससे मारता था। हाथ से डाल  दिया ,और एक कान का ताला कुंजी से खोला  ,और अंदर गया। फिर वही बाहर निकल कर ,नरगाओ की पीठ पर हाथ फेरा और मुंह पर चूमा ,और दाना घास खिला कर इधर को चला। मैं देखते ही जल्द दौड़ कर फिर कोठरी में छिपा।

          उस जवान ने ज़ंजीरें सब दरवाज़ों की खोल दी ,सारे गुलाम बाहर निकले। ज़ेर अंदाज़ और सालपची आफ़ताबा लेकर  हाज़िर हुए। वह वज़ू की खातिर खड़ा हुआ। जब नमाज़ अदा कर चूका ,पुकारा की वह दरवेश कहा है ?अपना नाम  सुनते ही मैं दौड़ कर रु बा रु जा खड़ा हुआ। फ़रमाया :बैठ मैं तस्लीम कर कर बैठा। खासा आया ,उसने खाया और फ़रमाया ,मुझे भी इनायत किया ,मैंने भी खाया ,जब दस्तख्वाँ बढ़ाया और हाथ धोये ,गुलामो को रुखसत  दी की जाकर सो रहो। जब कोई उस मकान में न रहा ,तब मुझसे हम कलाम हुआ और पूछा की ए अज़ीज़ ! तुझ पर ऐसी क्या आफत आ पड़ी है जो तू अपनी मौत को ढूंढता  फिरता है। मैंने अपना अहवाल आगाज़ से अंजाम  तक जो कुछ गुज़ारा था ,तफ्सील वार बयां किया और कहा : आपकी तवज्जा से उम्मीद है की अपनी मुराद  को पहुँचू ,उसने यह सुनते ही एक ठंढी सांस भरी और बेहोश हुआ और कहने लगा : बार ए खुदाया ! इश्क़ के दर्द  से तेरे सिवा कौन वाक़िफ़ है। जिसकी न फटी हो बिवाई ,क्या जाने पीर परायी। इस दर्द की क़द्र मंद हो सो जाने।

          बाद एक लम्हे के होश में आकर ,एक आह जिगर सोज़ भरी ,सारा मकान गूँज गया। तब मुझे यक़ीन हुआ  की यह भी  इसी इश्क़ की बला में गिरफ्तार है ,और इसी मर्ज़ का बीमार है। तब तो मैंने दिल चला कर कहा की मैंने अपना अहवाल  सब अर्ज़ किया ,आप तवज्जा फरमा कर ,अपनी सर गुज़िश्त से बंदे को खबर फरमाईये ,तोबा मक़दूर अपने  .पहले तुम्हारे वास्ते साई करू ,और दिल का मतलब कोशिश कर कर ,हाथ में लाउ। क़िस्सा वह आशिक़  सादिक़  ,मुझको अपना हमराज़ और हम दर्द जान कर ,अपना माजरा इस सूरत से बयां करने लगा ,की सुन ए अज़ीज़ ! मैं बादशाह ज़ादा जिगर सोज़ अकलीम नेम्रोज़ का हु। बादशाह यानि क़िब्ला गाह ने मेरे पैदा होने के बाद ,नजूमी   और राममल और पंडित जमा किये ,और फ़रमाया की अहवाल शहज़ादे के इत्तेला करने वालो को देखो और जांचो और जन्म पुत्री दुरुस्त करो ,और जो जो कुछ होता है  ,हक़ीक़त पल पल खड़ी खड़ी और पहर पहर और दिन दिन  ,महीने महीने और बरस बरस की मुफसिल हुज़ूर में अर्ज़ करो।  मो जब हुक्म बादशाह के ,सबने एक हो ,अपने अपने इल्म रो से ठहरा और साध कर इल्तेमास किया की खुदा के फ़ज़ल से ऐसी नेक साअत और सुभ लगन  में शहज़ादे का जन्म हुआ है की चाहिए सिकंदर की सी बादशाहत करे , और नो शेरवा सा आदिल हो।  और जितने इल्म  और हुनर है ,उनमे कामिल हो। और जिस काम की तरफ दिल उसका मायिल हो ,वह बा खूबी हासिल हो  .सखावत और शजाअत में ऐसा नाम पैदा करे की हातिम और रुस्तम को लोग भूल जाये। लेकिन १४ बरस  तलक सूरज और चाँद के देखने से एक बड़ा खतरा नज़र आता है , बल्कि यह विस्वास है की जुनूबी और सौदाई हो कर  बहुत आदमियों का खून करे ,और बस्ती से खबराए ,जंगल में निकल जाये। और चरिन्द परिन्द के साथ दिल  बहलाये। उसका उसका ताकीद रहे की रात  दिन आफताब माहताब को न देखे ,बल्कि आसमान की तरफ  भी निगाह न करने पाए। जो इतनी मुद्दत खैर व आफ़ियत से कटे ,तो फिर सारी उम्र सुख और चैन से सल्तनत करे।

यह सुन कर बादशाह ने इसी लिए इस बाग़ की बिना ( बुनियाद)  डाली और मकान हर एक नक़्शे के बनवाये। मेरे तह खाने  में पलने का हुक्म किया। और ऊपर एक बुर्ज नमदे का तैयार करवाया ,तो धुप और चांदनी उसमे से न छने। मैं दायी दूध पिलाई और अंगा छू छू और कई ख्वासो के साथ इस मुहाफिज़ात से उस मकान आली शान में परवरिश पाने लगा। और एक उस्ताद दाना ,कार आज़मोदा ,वास्ते मेरी तरबियत के तये किया ,तो तालीम हर इल्म और हुनर  की और मश्क़ हफ्ता क़लम लिखने की करे ,और जहा पनाह हमेशा मेरे खबर गीरा रहते ,दम बा दम की कैफियत रोज़ मर्रा हुज़ूर में अर्ज़  होती। मैं उस मकान ही को आलिम दुनिया जान कर ,खिलौनों और रंग फूलो से खेला करता।  और तमाम जहान की नेमते खाने के वास्ते मौजूद रहती ,जो चाहता सो खाता ,दस बरस की उम्र तक  जितनी क़ाबिलियत थी ,तहसील (हासिल) की।

         एक रोज़ उस गुम्बद के निचे रोशन दान से एक फूल अचंम्भे का नज़र पड़ा की देखते देखते बड़ा होता जाता था। मैंने चाहा  की हाथ से पकड़ लू , जैसे मैं हाथ लम्बा करता था ,वह ऊँचा हो जाता था।  मैं हैरान होकर उसे तक रहा था। वही एक आवाज़ क़हक़हे की मेरे कान में आयी। मैंने उसके देखने को गर्दन उठायी ,देखा तो नमदा चीयर कर एक मुखड़ा  चाँद का सा निकल रहा है। देखते ही उसके ,मेरे अक़्ल व होश ,बजार न रहे। फिर अपने आपको संभाल  कर देखा तो एक  तख़्त परिजादो के काँधे पर लटकी हुई खड़ा हिअ। और एक तख़्त नशीन ताज जवाहर का सर पर ,और क़ीमती झला बोर बदन में पहने हाथ में याक़ूत का प्याला लिए और शराब पिए हुए बैठी है।  वह तख़्त बुलंदी से आहिस्ता आहिस्ता निचे उतर कर उस बुर्ज में आया। तब परी ने मुझे बुलाया और अपने नज़दीक बिठाया ,बाते प्यार की करने लगी ,और मुंह से मुंह लगा कर ,एक जाम शराब गुल ए गुलाब का मेरे तये पिलाया और कहा : आदमी ज़ाद बे वफ़ा होता है ,लेकिन दिल हमारा तुझे चाहता है। एकदम में ऐसी ऐसी अंदाज़ व नाज़ की बाते की की दिल महू हो गया ,और ऐसी ख़ुशी हासिल हुई की ज़िंदगानी का मज़ा पाया ,और यह समझा की आज तो दुनिया में आया।

हासिल यह है की मैं तो क्या हु ,किसी ने यह आलम न देखा होगा ,न सुना होगा। इस मज़े में खातिर जमा से हम दोनों  बैठे थे की कुर्याल में गुलेला लगा। अब उस हादसा न गहानी का माजरा सुन ,की वही चार परी ज़ाद आसमान पर से  उतर कर ,कुछ उस माशूक़ा के कान में कहा। सुनते ही उसका चेहरा गरम हो गया। और मुझसे बोली की ए प्यारे ! दिल तो यह चाहता था की कोई दम तेरे साथ बैठ कर दिल बहलाऊ ,और इसी तरह हमेशा आउ ,या तुझे अपने साथ  ले जाऊ। पर यह आसमान दो शख्स को एक जगह आराम से और ख़ुशी से रहने नहीं देता। ले जाना !तेरा खुदा  निगाह बान है। यह सुन कर मेरे हवास जाते रहे ,और तोते हाथ के उड़ गए। मैंने कहा की अजी ,अब फिर कब मुलाक़ात होगी ? यह क्या तुमने गज़ब की बात सुनाई ? अगर जल्द आओगी तो मुझे जीता पाओगी नहीं तो पछताओगी। या अपना  ठिकाना और नाम व निशान बताओ की मैं ही उस पते पर ढूंढते ढूंढते खुद से तुम्हरे पास पहुचाऊ। यह सुन कर बोली : दूर पार ,शैतान के कान बहरे ,तुम्हारी सद व महीने साल की उम्र हो जाये। अगर ज़िन्दगी है  तो फिर मुलाक़ात होगी ,मैं जिनो की बादशाह के बेटी हु और कोहे काक में रहती हु। यह कह कर  तख़्त उठाया ,और जिस तरह उतरा  था वही बुलंद होने लगा।

जब तलक सामने था ,मेरी और उसकी चार आंखे हो रही थी। जब नज़रो से गायब हुआ ,यह हालत हो गयी जैसे परी का साया  होता है।अजब  तरह की उदासी दिल पर छा गयी ,अक़्ल व होश रुखसत हुआ ,दुनिया आँखों के तले अँधेरी हो गयी। हैरान परेशां ज़ार ज़ार रोना ,और सर पर ख़ाक उड़ाना ,कपड़े फाड़ना। न खाने की सुध ,न भले बुरे  की बुध।

 इस खराबी से दायी और बाक़ी लोग भी खबरदार हुए ,डरते डरते बादशाह के रु बा रु गए और अर्ज़ की की बादशाह  ज़ादा अल्मियां का यह हाल है। मालूम नहीं खुद बा खुद यह क्या गज़ब टूटा ,जो उनका आराम और खाना  पीना सब छूटा ? तब बादशाह ,वज़ीर ,उमराये साहब तदबीर ,और तबीब हाज़िक़ ,मुल्ला सियाने खूब ,दरवेश  सालिक और मजज़ूब ,अपने साथ लेकर उस बाग़ में रौनक अफ़ज़ा हुए। मेरी बे करारी और नाला व ज़ारी देख कर  ,उनकी हालत इज़्तराब (कांपना)हो गयी। अब दीदा हो कर ,बे इख़्तियार गले से लगा लिया ,और उसकी तदबीर  की खातिर हुक्म किया। हकीमो ने ताक़त दिल और खलल दिमाग के वास्ते नुस्खे लिखे। और मुल्लाओ ने नक़्श  व तावीज़ पिलाने और पास रखने को दिए ,दुआए पढ़ पढ़ कर फूंकने लगे। और नजूमी बोले की सितारों की गर्दिश  के सबब यह सूरत पेश आयी है ,इसका सदक़ा दीजिये। गरज़ हर कोई अपने अपने इल्म की बाते कहता था  मुझ पर जो गुज़रती थी ,मेरा दिल सहता था। किसी की तदबीर ,मेरी तक़दीर बद के काम न आयी। दिन बा दिन  दीवानगी का ज़ोर हुआ ,और मेरा बदन बे आब व दाने कमज़ोर हो चला। रात दिन चिल्लाना और सर पटकना  ही बाक़ी रहा। उस हालत में तीन साल गुज़रे। चौथे बरस एक सौदागर सैर व सफर करता हुआ आया। और हर  एक मुल्क के तोहफे अजीब व गरीब जहा पनाह के हुज़ूर में लाया ,मुलाज़िमत हासिल की।

 

            बादशाह ने बहुत तवज्जह फ़रमाई और अहवाल पुरसी  उसकी करके पूछा की तुमने बहुत मुल्क देखे कही कोई हकीम  कामिल भी नज़र पड़ा ,या किसी से उसका नाम सुना ? उसने इल्तेमास की की क़िब्ला आलम ! गुलाम ने बहुत  सैर की ,लेकिन हिन्दुस्तान में दरिया के बीच एक पहाड़ी है ,वहा एक गोसाये जटा धारी ने बड़ा मंडप महा देव का  और सांगत और बाग़ बड़ी बहार का बनाया है ,उसमे रहता है। उसका यह क़ायदा है की ब्रासवी दिन शिव रात  के रोज़ अपने इस्तहान से निकल कर दरिया में पीरता है और ख़ुशी करता है। असनान के बाद जब अपने आसन  पर जाने लगता है ,तब बीमार और दर्द मंद देस देस और मुल्क मुल्क के जो दूर दूर से आते है ,दरवाज़े पर जमा  होते है ,उनकी बड़ी भीड़ होती है।

वह महंत (जिसे इस ज़माने का अफलातून कहा जाता था) कारवारा और नब्ज़ (नस) देखता हुआ और हर एक को नुस्खा  लिख कर देता  हुआ चला जाता है। खुदा ने ऐसा दस्त शिफा उसको दिया है की दवा पीते ही असर होता है  ,और वह मर्ज़ बिलकुल जाता रहता है। यह माजरा मैंने बा चश्म खुद देखा ,और खुदा की क़ुदरत को याद किया ,की ऐसे ऐस  बंदे पैदा किये है। अगर हुक्म हो तो शहज़ादा आलमिया को उसके पास ले जाये ,उसको एक नज़र दिखाए  ,उम्मीद क़वी है की जल्द शिफा कामिल हो। और ज़ाहिर में भी यह तदबीर अच्छी है की हर एक मुल्क की हवा  खाने से और जा बा जा के आब व दाने से मिज़ाज में फरहत आती है। बादशाह को भी उसकी  सलाह पसंद आयी और खुश  होकर फ़रमाया : बहुत बेहतर शायद उसका हाथ रास आये ,और मेरे फ़रज़न्द  के दिल से वहशत  जाए।  एक अमीर ,जहा दीदा ,कार आज मोदा को और उस ताजिर को मेरी रकाब में लगाया गया। और असबाब ज़रूरी  साथ कर दिया। निवाड़े ,बाजरे,मोर पंखी ,पलवार ,लचके ,खेलने ,उलाक ,पातलियो पर मा सर अंजाम  सवार कर कर रुखसत किया।  मंज़िल मंज़िल चलते चलते उस ठिकाने पर जा पहुंचे। नयी हवा और नया दाना पानी खाने  पीने से कुछ मिज़ाज ठहरा ,लेकिन ख़ामोशी का वही आलम था ,और रोने से काम। दम बा दम याद उस परी  की दिल भूलती न थी ,अगर कभी भूलता तो यह बैत पढता।


                                      न जानू किस परी रु की नज़र हुई

                                      अभी तो था भला चंगा मेरा दिल

 बारे जब दो तीन महीने गुज़रे ,उस पहाड़ पर क़रीब चार हज़ार मरीज़ के जमा हुए। लेकिन सब यही कहते थे की अब खुदा  चाहे तो कुसाये अपने मुठ से निकलेंगे और सबको उनके फरमाने से शिफाये कुल्ली होगी। अल किससा  जिस दिन वह दिन आया ,सुबह को जोगी मानिंद आफ़ताब के निकल आया ,और दरिया में नहाया और पीरा। पार जा कर फिर आया ,और भभूत भस्म तमाम बदन में लगाया ,वह गोरा बदन मानिंद अंगारे के राख में छिपाया। और माथे पर मला गीर का टीका दिया। लंगोट बाँध कर अंगोछा काँधे पर डाला ,बालो का जुड़ा बाँधा ,मोछो पर ताव  देकर चढ़वान जूता इडाया। उसके चेहरे से यह मालूम होता था की सारी दुनिया उसके नज़दीक कुछ क़द्र नहीं रखती  ,एक क़लम दान जड़ाऊ बगल में लेकर ,एक एक तरफ देखता और नुस्खा देता हुआ  ,मेरे नज़दीक  आ पंहुचा। जब मेरी और उसकी चार नज़रे हुई ,खड़ा रह कर गौर में गया ,और मुझसे कहने लगा की हमारे साथ  आओ ,मई हम राह हो लिया।

 जब सबको नौबत हो चुकी तो मुझे बाग़ के अंदर ले गया ,और एक खुश नक़्शे खल्वत खाने में मुझे फ़रमाया की यहाँ तुम रहा करो ,और आप अपने अस्थान में गया। जब एक चिल्ला गुज़ारा ,तो मेरे पास आया और आगे की निस्बत मुझे खुश पाया  ,तब मुस्करा कर फ़रमाया  की इस बगीचे में सैर किया करो ,जिस मेवे पर जी चले ,खाया करो। और एक कुल्फी चीनी की माजून भरी हुई दी ,की उसमे से छह माशे हमेशा बिला नागा निहार नोश जान फ़रमाया करो। यह कह कर वह चला गया ,और मैंने उसके कहने पर अम्ल किया ,हर रोज़ ताक़त बदन में  और ख़ुशी दिल को मालूम होने लगी  ,लेकिन हज़रात इश्क़ को कुछ असर न हुआ उस परी की सूरत नज़रो के आगे फिरती थी।


             एक रोज़ ताक में एक जिल्द किताब की नज़र आयी ,उतार कर देखा तो सारे इल्म दीन और दुनिया के उसमे जमा किये  किये थे गोया दरिया को कोज़े में भर दिया था। हर घडी उसका मुतालबा किया करता। इल्म हिकमत  तस्खीर   निहायत ताक़त बहम पहुचायी। इस आरसे में बरस दिन गुज़र गया ,फिर वही ख़ुशी का दिन आया। जोगी अपने आसन पर से उठ कर बाहर निकला  .मैंने सलाम किया। उनने क़लम दान मुझे दे कर कहा : साथ चलो मैं भी  साथ  हो लिया। जब दरवाज़े से बाहर निकला ,एक अलीम दुआ देने लगा ,वह अमीर सौदागर मुझे साथ देख कर  ,गुसाई के क़दमों में गिरे और अदाए शुक्र करने लगे ,की आपकी तवज्जह से बारे इतना तो हुआ। वह अपनी   आदत पर ,दरिया के घाट तक गया और अस्नान पूजा जिस तरह हर साल करता था ,की फिरती बीमारों को देखता भालता चला आता था।

अचानक सौदाईयो के गौल में एक जवान खूबसूरत शकील की बुढ़ापे से खड़े होने की ताक़त उसमे न थी ,नज़र पड़ा।  मुझको कहा की इसको साथ ले आओ। सबकी दार व दर मन करके ,जब खल्वात खाने में गया ,थोड़ी सी खोपड़ी उस जवान की तराश  कर ,चाहा की कानखजूर  जो बैठा था ,जंबूर से उठा लिए। मेरे ख्याल में गुज़रा और बोल उठा  की अगर दस्त पनाह आग में गर्म कर कर ,उसकी पीठ पर रखे तो खूब है ,आपसे आप निकल आएगा ,और जो यु खीचेगा तो मुग्ज़ के गूदे को छोड़ेगा फिर खौफ ज़िन्दगी  को है।   यह सुन कर मेरी तरफ देखा और चिपका उठ बाग़ के कोने में एक दरख्त कौले में पकड़ ,जटा की लट की गले में फांसी लगा कर रह गया। मैंने पास जाकर जो देखा ,तो वाह वाह ! यह तो मर गया ,यह अचंभा देख कर निहायत अफ़सोस हुआ ,लाचार जी  में आया  उसे गाड़ दू।  जैसे दरख्त जुदा करने लगा ,दो कुंजिया उसकी लट्टू में से गिर पड़ी। मैंने उनको उठा लिया ,और उस  गंज खूबी को ज़मीन में दफन किया। वो दोनों कुंजिया लेकर सब तालो में लगाने लगा  .अचानक दो कमरे के ताले  उनसे खुले ,देखा तो ज़मीन से छत तलक जवाहर भरा हुआ है। और एक पेटी मखमल से मढ़ी ,सोने के पत्तर लगी ,ताला लगी हुई एक तरफ रखी हुई है। उसको जो खोला तो एक किताब देखि की उसमें इसम आज़म ,और हाज़िरात जिन्न ,व परी के और रूहो की मुलाक़ात और तस्खीर आफ़ताब की तरकीब लिखी है। 



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